गाँव की खुशबू

गाँव छोड़ शहर चले हम ,

सोचा था नामी कहलायेंगे हम ,

वहाँ जा कर पता चला ,

शहर है बहुत बड़ी बला ,

अब पता चला मुझे ,

कई बात सुझे ,

जहाँ माँ ने अपने हाथो से खिलाया था ,

पिता ने प्यास लगने पर पानी पिलाया था ,

ऐसी यादो  को भूल आया मै, 

शहर में कैसे घुल आया मैं ,

गाँव जैसी मिट्टी की खुशबू यहाँ  नहीं मिलती है ,

यहाँ बिना गमले गुलाब नहीं खिलती है ,

वहाँ के बगीचों में खेलना ,

खेतो की  कड़ी मेहनत को झेलना ,

यहाँ वो आनंद न मिलेगा ,

गांव में तो पत्थर पर भी फूल खिलेगा ,

गाँव में तो बिना मांगे दूध दही मिल जाता है ,

शहर में तो मांगने पर भी साफ पानी नहीं मिलता ,

गांव वाले तो बेशबर प्यार करते  है ,

 शहर वाले तो अपने फैशन के लिए कोयल का भी शिकार करते है ,

यहाँ न रह पाउँगा ,

गंदगी से मर गाऊंगा ,

मुझे वापस अपने गाँव जाना है,

वहाँ के लोगो का प्यार पाना है ,

माँ के हाथो का खाना खाना है ,

गांव में अपनों के साथ सारा जीवन बिताना है। . . . . . . . . . . . . . . . . .  

EMAIL-aa0215175@gmail.com

AUTHOR-AMRIT KUMAR FROM MAIRWA

Published by Ak Tech and education

AMRIT KUMAR

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