
गाँव छोड़ शहर चले हम ,
सोचा था नामी कहलायेंगे हम ,
वहाँ जा कर पता चला ,
शहर है बहुत बड़ी बला ,
अब पता चला मुझे ,
कई बात सुझे ,
जहाँ माँ ने अपने हाथो से खिलाया था ,
पिता ने प्यास लगने पर पानी पिलाया था ,

ऐसी यादो को भूल आया मै,
शहर में कैसे घुल आया मैं ,
गाँव जैसी मिट्टी की खुशबू यहाँ नहीं मिलती है ,
यहाँ बिना गमले गुलाब नहीं खिलती है ,
वहाँ के बगीचों में खेलना ,
खेतो की कड़ी मेहनत को झेलना ,
यहाँ वो आनंद न मिलेगा ,
गांव में तो पत्थर पर भी फूल खिलेगा ,
गाँव में तो बिना मांगे दूध दही मिल जाता है ,

शहर में तो मांगने पर भी साफ पानी नहीं मिलता ,
गांव वाले तो बेशबर प्यार करते है ,
शहर वाले तो अपने फैशन के लिए कोयल का भी शिकार करते है ,
यहाँ न रह पाउँगा ,
गंदगी से मर गाऊंगा ,
मुझे वापस अपने गाँव जाना है,
वहाँ के लोगो का प्यार पाना है ,
माँ के हाथो का खाना खाना है ,
गांव में अपनों के साथ सारा जीवन बिताना है। . . . . . . . . . . . . . . . . .
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AUTHOR-AMRIT KUMAR FROM MAIRWA
Hii nice poem
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